Book 2015 – Hindi

"मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर"
(Towards Spiritual, Social, Economic Swaraj)

  • अध्याय सूची
  • आमुख
  • मेरी बात
  • मेरी परिकल्पनाएँ
  • समाधान
  • पुस्तक समर्पण
देवतुल्य-परिवतर्क खंड
  • डा० देबाल देब, पश्चिम बंगाल
  • मैं भारत में आजतक ऐसे किसी मनुष्य से नहीं मिला जो समाजवाद को इतनी निकटता से स्वयं के जीवन में प्रमाणिकता के साथ जी गया हो, वह भी बहुत ऊंची पढ़ाई करने के बावजूद। देबाल पानी की तरह साफ हैं, उनके व्यक्तित्व में दोहरापन नहीं है, भ्रम नहीं है, झूठ नहीं है, तिकड़म नहीं है, अहंकार नहीं है। देबाल जैसे हैं वैसे ही प्रस्तुत होते हैं, बनावटी नहीं हैं, मूल्यों को ओढ़कर नहीं प्रस्तुत होते हैं।  डा० देबाल देब धन, संपत्ति पहचान व पुरस्कार आदि के लिए कोई लिप्सा रखे बिना ही गंभीरता व समर्पण से कार्य करते हैं।

    डा० देबाल इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस बैंगलोर से पोस्ट-डाक्टरेट हैं, अमेरिका की कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से भी पोस्ट-डाक्टरेट हैं और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के वैज्ञानिक हैं। पढ़ाई पूरी करके अमेरिका से लौटने पर अपनी सारी बचत का प्रयोग सामाजिक कार्यों में लगा दिया। पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले में पांचाल के पास समाज के नाम से जमीन खरीदी और खेती के प्रयोग शुरू किए।

    अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कृषि वैज्ञानिक डा० देबाल देब ने अपनी पत्नीं को विवाह के पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि विवाह के बाद भी डा० देबाल अपनी योग्यता व क्षमता का प्रयोग व्यक्तिगत-संपत्तियो, जमीन-जायजाद आदि में बिलकुल नहीं करेंगें और संतान भी नहीं पैदा करेंगें। आज भी दोनो लोग सामाजिक उत्थान के लिए प्रतिबद्धता व समर्पण के साथ बिना बाजार व मुद्रा लाभ में लिप्त हुए देश विदेश के हजारों किसान परिवारों की आर्थिक, मानसिक व सामाजिक समृद्धि के लिए अपनी पूरी ऊर्जा व संसाधनों के साथ लगे हुए हैं।
  • उमाकांत उमराव IAS, मध्यप्रदेश
  • उत्तरप्रदेश के गाँव में पले बढ़े, मध्यप्रदेश कैडर में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी उमाकांत उमराव की सबसे बड़ी खासियत गाँवों व गाँव वालों का मनोविज्ञान और उनकी जरूरतों को बहुत ही अच्छे से समझना है। यही कारण है कि गाँव में किसान परिवार में पैदा हुआ और गाँव में पला बढ़ा हुआ यह गँवार “जननी एक्सप्रेस योजना” जैसी कल्याणकारी राष्ट्रीय योजना का जनक बनता है; ग्वालियर स्वास्थ्य कार्ड का विचार देता है; मरुस्थल में परिवर्तित होते जा रहे देवास जैसे जिले में तालाब-क्रांति का सूत्रपात करके वहां के सैकड़ों गाँवों के लगभग हर एक किसान परिवार का जीवन पूरी तरह से बदल देता है और वन्य-जीव-चक्र को प्राकृतिक रूप से पुनर्वासित कर देता है।

    जननी एक्सप्रेस जैसी देश व्यापी स्वास्थ्य योजना का जनक, सैकड़ों गाँवों को आर्थिक, सामाजिक व पर्यावरण की अद्वितीयता की ओर गति करने की नीव रखने और हजारों किसान परिवारों के जीवन में आमूलचूल विकास कर देने वाला उमाकांत उमराव जहां जाता है, वहीं आम समाज के लिए संकल्पनाएं करता है और व्यावहारिक अद्वितीयता के साथ समाज हित की संकल्पनाओं को धरातल पर उतारता है। उमाकांत उमराव उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के एक गाँव में एक किसान परिवार में पैदा हुआ एक “गवांर” है। जिसके माता-पिता कहने को जमींदार परिवार के वारिस थे, लेकिन काल-परिस्थिति ने उनको अपनी जमीन पर खुद ही खेती-बाड़ी करने वाला सामान्य किसान बना दिया था।

    सुबह चार बजे जगना, किरोसीन के तेल से जलने वाली लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करना, घर की गायों, भैंसों व बैलों आदि की सेवा-टहल करने में माता-पिता की मदद करना, प्लास्टिक की बोरी से सिलकर बनाए हुए झोलेनुमा झोले में कापी-किताबें भरकर पाँच-छः किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुँचना, स्कूल में पढ़ाई करना, स्कूल से पाँच-छः किलोमीटर पैदल चलकर घर वापस आना, खेतों में जाकर माता-पिता का सहयोग करना या कभी मित्रों के साथ खेलना-कूदना फिर घर की गायों, भैंसों व बैलों आदि की सेवा-टहल करने में माता-पिता की मदद करना, लालटेन की रोशनी में देर-रात तक पढ़ाई करना और सो जाना। शौच क्रिया के लिए सुबह-शाम गाँव के किनारे बहने वाली नहर के किनारे अपने खेतों में जाते थे, लौटते समय इच्छा होने पर उसी नहर में तैर भी लिया और नहा भी लिया। नहर से घर तक, खेतों की मेढ़ों वाले रास्ते में पड़ने वाले बगीचों के पेड़ों से पेड़ पर चढ़ कर फल तोड़ लिया और खा लिया। बचपन से किशोरावस्था तक उमाकांत की दिनचर्या यही रही।
अमला रुईया, महाराष्ट्र

उस जमाने के भारत के सबसे समृद्ध व्यक्तियों में से एक कलकत्ता के शांति प्रसाद जैन के सानिध्य एवम् हिसार हरियाणा में पलीं, अमीर व्यापारी पिता की पुत्री, रामगढ़ शेखावाटी के अत्यधिक अमीर व्यापारी के पुत्र व फोनिक्स मिल के मालिक अशोक रुइया की पत्नी, कुछ वर्ष पूर्व फोर्ब्स की सूची में स्थान प्राप्त करने वाले युवा अतुल रुइया की माता व विख्यात उद्योगपति डालमिया की समधन लगभग सत्तर वर्षीय अमला रुइया का जीवन आम व्यक्ति के लिए अकल्पनीय ऐश्वर्य में व्यतीत हुआ है।

अमला रुइया ने ऐश्वर्य में रहते हुए भी अपनी चेतनशीलता, भावना व संवेदनशीलता का विकास किया। अद्वैतवादी मनुष्य के रूप में दूसरे मनुष्यों के प्रति अपना संबंध व उत्तरदायित्व महसूस करते हुए मानव-निर्मित तंत्रों के कारण व्यवहारिक रूप से प्रतिसंभव सामाजिक उत्थान के लिए प्रयास करती रहतीं हैं।

अमला रुइया ने भारत के कई राज्यों के सैकड़ों अतिपिछड़े गांवों के हजारों परिवारों का जीवन परिवर्तित कर दिया। लोगों के बीच "पानी माता" के नाम से विख्यात हुईं। दशकों से सूखी पड़ी, मृत हो चुकी नदियों को उनके बहाव के साथ पुनर्जीवित किया।

द्वारको सुंदरानी, बोधगया बिहार/गुजरात

विनोबा भावे के कहने पर गुजरात में प्रतिष्ठित परिवार में पैदा हुए कम ज्यादा लगभग पिंचानबे वर्षीय द्वारको सुंदरानी ने आज से लगभग तिरेसठ-चौसठ वर्ष पूर्व अपने घर परिवार को छोड़कर सामाजिक कार्यों में अपना जीवन न्योछावर कर दिया था। किशोरावस्था से ही द्वारको सुंदरानी विभिन्न सामाजिक आंदोलनों व कार्यों में सक्रिय भागीदारी करते रहे थे। लगभग साठ-इकसठ वर्ष पूर्व एक दिन विनोबा भावे ने द्वारको सुंदरानी से कहा कि द्वारको को बोधगया बिहार में स्वनिर्भरता व स्वावलंबन का मॉडल स्थापित करना है। द्वारको सुंदरानी ने विनोबा भावे के आदेश को शिरोधार्य किया और बोधगया जाने की अनुमति मांगी।

विनोबा भावे ने द्वारको से कहा कि गया रेलवे स्टेशन पहुंचते ही द्वारको के पास जितना भी धन होगा वह सब भिखारियों को दान देना होगा, गया रेलवे स्टेशन से बोधगया तक पैदल जाना होगा और कार्य प्रारंभ करना होगा। विनोबा भावे प्रति माह तीस रुपए द्वारको सुंदरानी को भोजन, कपड़े, प्रशासनिक व्यय, सामुदायिक गतिविधियों पर होने वाले व्यय आदि के लिए उपलब्ध कराते रहेंगें। तीस रुपए महीने की छोटी राशि से सात महीने तक द्वारको सुंदरानी बिलकुल अनजान स्थान व अनजान लोगों के बीच रहने व काम करने का प्रयास करते रहे। इतने समय में द्वारको सुंदरानी ने स्थानीय लोगो के मन में इतनी विश्वसनीयता प्राप्त कर ली थी कि उनको विनोबा भावे से प्रति माह मिलने वाली की विशेष आवश्यकता नहीं रह गई थी।

गुजरात के समृद्ध परिवार से ताल्लकु रखने वाले द्वारको सुंदरानी ने विनोबा भावे के कहने पर खुद को कष्टों में झेलकर अपनी इच्छाशक्ति, प्रतिबद्धता आदि की जांच जीवंत रूप में जीने की प्रमाणिकता से किया। स्वयं की जांच में सफलता होने के बाद द्वारको सुंदरानी ने गया जिले के बीहड़ व अति पिछड़े बंजर भूमि वाले गांवों में शिक्षा व आर्थिक स्वावलंबन आदि के लिए बहुत काम किया। द्वारको सुंदरानी ने ग्यारह गाँव स्थापित किए और लोगों को जल-संग्रहण व कृषि करने के लिए प्रेरित किया।

वरुण आर्य, राजस्थान

रात में मिठाई के डिब्बे बनाना, सुबह स्कूल जाना, दोपहर से शाम तक दुकानों में गंदे बर्तन धोने से जीवन की शुरुआत करने वाले वरुण आर्या ने आई0आई0टी0 दिल्ली से पांच विर्षीय परास्नातक प्रथम श्रेणी में किया, आई0आई0एम0 अहमदाबाद से प्रबंधन में परास्नातक प्रथम श्रेणी में किया। नौकरी करने की शुरुआत करने के कुछ ही वर्षों में एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी के महाप्रबंधक बने। फिर एक झटके में सबकुछ छोड़कर किशोरों व युवाओं के विकास के लिए उद्यमी शिक्षा व पर्यावरण संवर्धन में लग गए। वरुण आर्या कहते हैं कि वे बिलकुल भी नहीं मानते कि गरीबी, असुविधाएं व परिस्थितियां किसी को आगे बढ़ने से रोक सकती हैं।

रात में सोने के पहले भोजन मिल सके, दिन में नंगे न रहना पड़े, पढ़ाई जारी रखने के लिए स्कूल की फीस भर जाए एवम् सेकंड हैंड किताबें मिल जाएं आदि की कसमकश के लिए छोटी उम्र से ही विभिन्न प्रकार की मजदूरी करने वाले वरुण इच्छाशक्ति के धनी, कल्पनाशील, रचनाशील, मेधावी व प्रतिभावान थे। स्थानीय सरकारी विद्यालय से हिंदी माध्यम में उच्च माध्यमिक शिक्षा के पश्चात आई०आई०टी० दिल्ली में पांच वर्षीय परास्नातक में छात्रवृति के साथ प्रवेश मिला। आई०आई०टी० के छात्रावास में वरुण ने जाना कि अच्छा भोजन क्या होता है, बारिश में बिना चूने वाली छत का कमरा क्या होता है, अपना बिस्तर क्या होता है, मजदूरी करने की जगह खेलना क्या होता है व शाम की रोटी की चिंता किए बगैर सोना क्या होता है!

जोधपुर में किराये के भवन में अरावली इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट नामक प्रबंधन का संस्थान खोला, छात्रों को बेहतर दृष्टि का प्रबंधक बनने के लिए प्रेरित किया जा सके इसलिए देश भर के उन लोगों से संपर्क किया जो दृष्टि के साथ सामाजिक उद्यमशीलता में लगे रहते हैं, उनके अनुभवों को छात्रों के साथ साझा करते हुए चंद वर्षों में ही देश में संस्थान को पहचान दिलाई। संस्थान की सफलता से कुछ आय होने पर जोधपुर से लगभग पैंतालीस किलोमीटर की दूरी पर लगभग सौ एकड़ की नमकीन व बंजर जमीन खरीदी। सपना देखा कि आई०आई०एम० जैसा संस्थान स्थापित करेंगें जो छात्रों को सामाजिक मूल्यों की भी शिक्षा प्रदान करे।

जो नमकीन व बंजर भूमि सैकड़ों वर्षों से कभी प्रयोग नहीं की गई, उस जमीन को बिना ऊबे सात साल की अनवरत मेहनत से एक तरह से स्वर्ग में बदल दिया। पंद्रह सुंदर झीलें बनाईं जो वर्षा जल संग्रहण का जीवंत प्रमाण हैं, पहले इन झीलों का पानी नमकीन होता था आज झील का पानी मीठा व पीने योग्य हो चुका है, झीलों में बहुत प्रकार की प्रजातियों की पक्षियों को कलरव करते देखा जा सकता है। लंबें डैने व लाल गर्दन वाले प्रवासी सारस हर वर्ष आते हैं। परिसर में हजारों पेड़ पौधे हैं, सब्जियाँ उगाई जातीं हैं, औषधियों के सैकड़ों पौधे हैं, जंगली जीवों का जीवन चक्र प्रारंभ हो चुका है, जंगली खरगोश स्थायी निवासी बन चुके हैं। वरुण आर्या के द्वारा किए गए भूमी सुधार व वर्षा जल संग्रहण के प्रयासों के प्रभाव से आसपास की जमीनों में भी अब घास उगने लगी है, छोटे-मोटे पौधे विकसित होने लगे हैं।

ओम प्रकाश चौधरी IAS, छत्तीसगढ़

“ बच्चे देश व समाज का भविष्य के निर्माता होते हैं। मैं अपनी पूरी ताकत से बच्चों को शिक्षा का वातावरण व खुले आसमान जैसा अनावरण देना चाहता हूँ ताकि वे अपने जीवन में आसमान को छूने तक की कल्पनाएं कर पाएं। आदिवासी बच्चों के माता पिता बहुत हिंसा देख चुके हैं, उनकी अगली पीढ़ियों को अब विश्व का क्षितिज देखना चाहिए। समाज हिंसक तरीके से कभी भी बेहतर सामाजिक समाधान की ओर नहीं बढ़ सकता है। बिना बेहतर शिक्षा के बेहतर समाज का निर्माण व्यवहारिक रूप से बिलकुल भी संभव नहीं है। जिनको शिक्षा दी जा सकती है उनको शिक्षा का बेहतर वातावरण उपलब्ध कराना, जिनका शिक्षा प्राप्त करने का समय निकल गया उनको रोजगार के लिए सक्षम बनाने के संसाधन व व्यवस्था उपलब्ध कराना चाहता हूँ। समाज के किसी भी वर्ग को अछूता नहीं छोड़ा जा सकता है। एक बेहतर समाज का निर्माण सभी के विकास व सभी के लिए उचित वातावरण होने से ही संभव है। ”

मेरी बात अटपटी सी है लेकिन ओपी चौधरी के बारे में सोचते हुए मेरे अंदर जो भाव सबसे पहले मेरे मन में आते हैं वे यही हैं। आधुनिक बस्तर के इतिहास में एनजीओ, राजनेता, नेता, व्यापारी, नौकरशाह या पत्रकार किसी भी जमात की तुलना कर ली जाए, ओपी चौधरी के जैसा आदिवासी समाज के सामान्य जन के लिए शिक्षा के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास करने वाला, प्रेरित करने वाला व ढेरों संसाधन उपलब्ध कराने वाला इतना सक्रिय मनुष्य नहीं मिलेगा।

भारत के समाज की मुख्यधारा में बस्तर जैसे क्षेत्रों में कुछ दिन या सप्ताह रह लेना। सरकारी या गैर-सरकारी एनजीओ या सामाजिक कल्याण विभागों के चलने वाले प्रोजेक्ट्स का सुदूर से हिस्सा बन जाना। आदि-आदि इतनी बड़ी बातें मानी जाती रहीं हैं कि बहुत लोगों को आदिवासी समाज का विशेषज्ञ मान लिया गया और आदिवासी विकास के लिए बनाई जाने वाली नीतियों में उनकी सलाहें ली जाने लगीं। इन्हीं अतथ्यात्मक, ऊबड़-खाबड़ व हवाई तौर-तरीकों के कारण ही चाहे-अनचाहे आदिवासी क्षेत्र असंवेदनशील बनते चले गए क्योंकि ऐसे क्षेत्रों के निवासियों को लगता रहा कि उनको अपने ही जीवन के बारे में ही निर्णय लेने के अधिकार नहीं हैं जबकि जीवन में घनघोर संघर्ष, प्रताड़नाएं एवम् दुःख झेलने पड़ते हैं। आदिवासी क्षेत्रों के लोगों के विशेषज्ञ बनने का दावा करते हुए दशकों तक नौकरशाहों, चिंतकों, एनजीओ संचालकों आदि ने देश विदेश में अपने लिए बड़े-बड़े पुरस्कार, नाम-पहचान व ग्लैमर को भोगा व संजोया जबकि इन क्षेत्रों के आम आदिवासियों की हालात दिन प्रतिदिन तुलनात्मक रूप से बद से बदतर होती चली गई।

अलेक्सिस रोमन, बुंदेलखंड/फ्रांस

फ्रांस का एक युवा, स्नातक का छात्र, बचत करके भारत आकर अत्यधिक पिछड़े बंजर क्षेत्र में पहुंचता है। वहां वह किसी को नहीं जानता, खानपान व भाषा से परिचित नहीं, उसका शरीर वहां के मौसम व वातावरण को झेलने का आदी नहीं। फ्रांसीसी युवा का भारत से कोई संबंध नहीं फिर भी युवा खोज कर भारत के पिछड़े क्षेत्रों में पहुंचता है और वहां के लोगों का जीवन स्तर बेहतर करने के लिए अपने जीवन के सुखों व सुविधाओं को छोड़कर घोर संघर्ष करता है जबकि जिस देश के लोगो के लिए अकेले ही गावों में लोगों को पानी, जंगल व खेती के लिए तथा आर्थिक विकास के लिए संघर्ष करता है वही देश उसके धरातलीय कामों को उपेक्षित करता है।

कृष्ण कुमार जाखड़, राजस्थान

कृष्ण कुमार जाखड़ प्रयोगधर्मी किसान हैं। विज्ञान से स्नातक करने के बाद अच्छी सरकारी नौकरियों व व्यापार करने के सरल अवसर उपलब्ध होते हुए भी युवा कृष्ण कुमार जाखड़ की दूरदृष्टि ने जल्द ही महसूस कर लिया था कि यदि किसान को संवर्धित करना है तो जमीन को संवर्धित करना होगा। जमीन संवर्धित होने से खेती की लागत कम होगी जिससे किसान संवर्धित होगा। कृष्ण कुमार जाखड़ ने रासायनिक खाद व कीटनाशक का प्रयोग बिलकुल बंद कर दिया और पुराने समय की कुदरती खेती को समझने का प्रयास शुरु कर दिया। पिता से प्राप्त पारंपरिक जमीन का आधा से अधिक भाग रेतीला था। कृष्ण कुमार जाखड़ ने रेतीली जमीन को उपजाऊ जमीन के रूप मे विकसित किया। जमीन, पौधे व पानी के रिश्तों को समझा। इन रिश्तों को समझने के लिए जाखड़ ने अपनी जमीन पर बहुत प्रयोग किए।

कृष्ण कुमार जाखड़ के पिता किसान थे, कृष्ण कुमार जाखड़ किसान हैं और इनके पुत्र भी किसान है। कृष्ण कुमार विज्ञान के स्नातक हैं, इनके एकमात्र पुत्र प्रबंधन से परास्नातक हैं, अच्छे वेतनमान की नौकरी किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सरलता से कर सकते थे, लेकिन प्रबंधन से परास्नातक होने और यूरोप भ्रमण से आने के बाद जब कृष्ण कुमार जाखड़ ने इनसे पूछा कि कंपनी में नौकरी करनी है या कोई व्यापार। पुत्र ने जवाब दिया कि आपकी तरह ही खेती करनी है। कृष्ण कुमार जाखड़ अपवाद पिता हैं इसलिए पुत्र के द्वारा खेती करने का निर्णय लेने पर प्रसन्नता महसूस करते हुए पुत्र के निर्णय का स्वागत किया। पिता पुत्र मिलकर सीखते व सिखाते हुए खेती व किसान के विकास के लिए जीवंत शोधों को गलबहियाँ डाल करते हुए संबंधो को जीते हैं और आनंद लेते हैं।

राजेंद्र गायकवाड़, छत्तीसगढ़

हरिजन जाति के बंधुआ मजदूर के पुत्र राजेंद्र गायकवाड़ का जीवन बचपन से लेकर युवावस्था तक बहुत ही अधिक गरीबी, शारीरिक व मानसिक पीड़ा, संघर्ष व जाति के कारण अपमानों व उपेक्षाओं में गुजरा। पिता सागर जिला, मध्य प्रदेश के एक गाँव में एक सामंत के यहाँ बंधुआ मजदूर थे। राजेंद्र गायकवाड़ की पैदाइश से सामंत परिवार खुश हुआ कि एक और बंधुआ मजदूर आ गया।

बीड़ी मजदूर के रूप में काम करना बारहवीं कक्षा तक जारी रहा ताकि स्कूल की फीस व किताबों आदि का प्रबंध हो पाए। गरीबी की स्थिति यह थी कि स्नातक में प्रवेश लेकर पढ़ाई करने के लिये कॉलेज जाने के लिये पहनने के लिए  कपड़े नहीं थे। 

स्वाभाविक रूप में चलती हुई किसी कठिन या सरल पद्धति की रचनात्मकता का अनुसरण करना सरल होता है, लेकिन अपवाद स्वरूप रचनात्मकता को और भी परिष्कृत करते हुए अद्वितीय कर देना बहुत दुष्कर होता है, यूं कहा जाए कि असंभव होता है। ऐसे ही असंभव को धरातल में स्थापित कर देने वाले, सैकड़ों कैदियों की सोच, मानसिकता, जीवन-दर्शन परिवर्तित करके धनात्मक लक्ष्य की दिशा देने वाले दृष्टिवान् राजेंद्र गायकवाड़ का जीवन पीड़ाओं, संघर्षों व जीवंत रचनाओं से भरी एक किताब है।

सन् 1994 में राज्य स्तरीय प्रतिस्पर्धा में चयनित होकर जिला कारागार अधीक्षक बने। राजेंद्र उस समय के मध्यप्रदेश राज्य के अहरवार समाज के पहले जिला कारागार अधीक्षक बने। पैदा होने से लेकर संपूर्ण जीवन जातिवाद का लगातार दंश झेलने वाले राजेंद्र गायकवाड़ का पूरा बचपन, किशोरावस्था व युवावस्था गरीबी, शोषण, अपमान व पीड़ा से भरा हुआ रहा; लेकिन अपने विचारों, समझ, संवेदनशीलता व सक्रिय क्रियाशीलता से कारागारों व कैदियों के सुधार के लिये अद्वितीय काम धरातल में करते आ रहे हैं। उन्होंने छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग के जगदलपुर केंद्रीय-कारागार को भारत देश के आदर्श कारागारों में से प्रतिष्ठित कर दिया है।

देवतुल्य-समाजबंधु खंड
यायावर के अनुप्रयोग एवम् सामाजिक गतिविधियाँ खंड
सामाजिक अनुकूलन पर बेबाक सामाजिक-यायावर खंड
धर्म, ईश्वर, स्वर्ग, युग, वेद आदि
जाति-व्यवस्था
भारतीय परिवार
नौकरशाही और भारत
सफलता व उपलब्धि
यायावर की आत्मकथा खंड
स्मृतियाँ खंड
मध्यस्थ दर्शन (जीवन विद्या)

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